Friday, 10 April 2020

मौलवी साहब

पहले घर की दालान से शिव मंदिर दिखता था
आहिस्ता आहिस्ता साल दर साल
रंग बिरंगे पत्थरों ने घेर लिया
मेरी आँख और शिव मंदिर के बिच के फासले को।
अब दालान से नहीं दिखता है और ना ही दिखते है कई लोग
जो इन रंग बिरंगे पत्थरों के ना होने पर दिखते थे

लेकिन कुछ लोग मुझे याद है
उसी शिव मंदिर के बगल की बस्ती से
अक्सर आया करते थे
जब दादी ज़िंदा थी
दादी को याद थी उस बस्ती के एक एक मकान की कहानी
और उसमे रहने वाले हर शख्स की शक्ल और सीरत
कहने को नाम मौलवी साहब था
काम कम्पाउंडर का करते थे
दादी के कहने पर बुला लाया करता था ,
साइकिल से , गुजरते हुए उस शिव मंदिर से
याद था मुझे उनका घर , उनके पडोसी
उनके उठने का वक्त और ये कि
चाय में वो चीनी कम पीते थे।

लम्बी दाढ़ी, ऊँ चढ़ा पायजामा
और सर पे एक सफ़ेद टोपी
साइकिल पे एक अदना सा थैला
जिसमे थे कुछ नुस्खे
जिनसे दादी ठीक हो जाया करती थी
उनकी साइकिल की आवाज भर से
निकल आते थे दादा और दादी
धुंधली होती रैशनी में भी दिख जाता था
एक स्वस्थ कल , और इस तरह दालान में
चौकी के बगल में बिछ जाती थी कुर्सियां
और चाय  बनादो कि आवाज पहुंच जाती थी रसोई तक

दादी की आँखों में देखा था मैंने
भरोसा
और दादा का हर बात पर उनको समझाना
कि कर  देंगे मौलवी साहब सब ठीक


मौलवी साहब ना हुए
 जादूगर हो गए
और उनका वो थैला
दुनिया के तमाम मुश्किलों का हल
क्यों करती है दादी इनपर इतना भरोसा

इस तरह  दादी ठीक हो जाया करती थी
फिर लग जाती थी बीनने साग
या राह देखने की उसी शिव मंदिर की तरफ
से कोई और भी आए।

दादी नहीं रही अब , दादा भी।
सोंचता हूँ , डरता भी
कि  बीमार  तो  होती होंगी अब भी वो
दादा फिर चिंतित हो जाते होंगे
टहलने लग जाते होंगे तेज पांव से दालान में
आँखे लग जाती होंगी किसी शिव मंदिर की और

उम्मीद  है अल्लाह मियाँ से इजाज़त लेकर
बैकुंठ में जाते होंगे दादी और दादा को देखने
मौलवी साहब , वहा भी कोई शिव मंदिर होगा
वही से गुजरकर



Thursday, 27 September 2018

बहुत फायदे है इस शोर के

मै जानता हु शोर बहुत है
इतना ज्यादा कि
तुम्हारी आवाज़ भी तुम तक
नहीं पहुंच रही
तुम चाहते भी यही हो
और तुम मानते हो कि
ये ज़रुरी भी नहीं।
फिर विरोध करते है ?
उस शोर का ?
लेकिन ये तो वही शोर है
ऐसी आवाजों से बना हुआ
शोर जो मुँह से बोला तो जाता है
लेकिन कान तक पहुंचने के लिए नहीं
केवल शोर पैदा करने के लिए
जैसे तुम्हारी आवाज़ जो तुम
चाहते हो तुम्हारे या किसी की कानों
पे ना पहुंचे बस शोर बन के रहे
बहुत फायदे है इस शोर के



Monday, 24 September 2018

Sustainable Tourism : Only way to promote and sustain tourism Industry in India

Sustainable tourism is the concept of visiting a place as a tourist and trying to make a positive impact on the environment, society, and economy. ( Source : Wikipedia ). 


PC/Source  ( BBC )

The pic is of Mount Everest, Yes, if we can clean the toughest and highest peak of the world then why not other places. We are irresponsible because we have not been able to visualize the impact of irregularities of waste management and our laid back attitude towards a particular habitat.  

As a traveler/tourist are you ?


  • Throwing plastic bottles / wrappers / other plastic materials on roads/remote places.
  • Extensiveness using toiletries.
  • Regularly washing cloths on mountain side hotels/inns as we do at our homes
  • Not refiling water bottles
  • Overlooking small irregularities of throwing small plastic wrappers such as of a chocolate.  
  • Demanding luxury even at remotest villages of the country. ( This creates market pressure of supply)



I have been a traveler all across my life. I can remember last two decades when I started visiting places across length and breadth of this sub continent called India. Born and brought up in the Gangatic plains, started professional studies in old still young national capital Delhi. Done my B.Tech around Sahyadries, near to Goa - Dharwad. Worked in Bangalore and now semi settled in Delhi . Like me many people must have seen places dying. I have seen and experienced personally what "Development" has done to hill stations of India. Kodaikanal, Ooty, Nainital, Shimla, Darjeeling and list goes on. Even Leh - Laddakh, Spiti and entire Kangra Valley is no more a hill station for me but a place where
hashtag

garbage is dumped from across India. Believe me government plays a very small role in maintaining these places, Its we the travelers ( not tourists ) who need to take responsibility in saving our tourist destinations. Development ensures every body can visit every place across the nation but there are certain moral responsibility towards particular habitat that we need to follow and teach people who don't know. When I was in my last days of Jharkhand visit this year May I read a survey and the survey says, people are not happy with the climate change in Ranchi, Hazaribagh but they have done nothing to stop it. Same goes with the entire country. Still Jharkhand has 28 % of the forest cover area and I would urge people of Jharkhand to maintain it atleast. 

Now there is no lake, Was crossing through my old apartment near IBLURU lake in Bangalore after a gap of 36 months this June and suddenly I  realized there used to be a lake and now, its no more.  Urbanization and creation of concrete forest will give us nothing. I am sorry to say but garden city is no more a garden city. The low voting turn around, garbage problem, lack of "know how" towards sustainable development. Shouldn't we expect more from techno - well educated crowd ?.

The list goes on, wherever I go I see people, travelers least bothered about sustainability of the place. My recent visit to Parashar lake was a question on my responsibility when locals were afraid after seeing the bulk coming to the places this season.




Why are locals afraid? Only because of habits that a common Indian traveler possess. We don't want to come out of our comfort zone. We still want all the facilities in each and every habitat and conditions. The local area gets impacted by market pressure and theory of demand and supply. They start creating. Same kind of market as we have in urban areas.

( Source : Maverick Times) 

Under serious market pressure , even the remotest villages of India are providing all the plastic packed materials to tourists and travelers. Toiletries, packed bottled water, cold drinks and chips are main source of garbage. We can't blame locales as they are under huge market pressure by the demand. Only way to reduce at this time is to reduce demand of such items in tourist places and create demand for sustainable local products / food and start refilling bottles. This is a habit a traveler should have, a tourist should develop and a local to start following since day one. Days are very near when we'll loose many tourist destinations across India and future generation will enjoy the beauty only in pictures. 

Steps required to start this sustainable tourism in India. 
  • Training local hospitality partners 
  • Start a nation wide campaign with the help of bloggers and influences to  create and maintain a sustainable demand and supply market. 
  • All tour guides must follow strict rules.
  • Travel companies like other do's and don'ts publish some strict rules regarding sustainable tourism. 
  • Start avoiding packed bottled water and create a habit of refilling at least in mountains



Looking to create a team for this campaign. I am positive of creating a team for this.











Monday, 17 September 2018

स्मृतियों पे प्रेम और रिश्ते को ज़िंदा रखना कठिन होता है।

प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो  ..... लता मंगेशकर, हेमंत कुमार और गुलज़ार साहब ने एक गाना नहीं बल्कि एक फलसफा दे दिया।  अक्सर सोचता हूँ रिश्तों के बारे में, सभी सोचते होंगे सबका अपना नजरिया है , दोस्ती प्यार , रिश्तेदार , बेस्ट फ्रेंड और ना जाने कितने सारे नामी बेनामी मोहब्बत वाले रिश्ते।  कभी एक राह चलते यात्री से तो कभी ट्रेन में बैठे सामने वाली बर्थ पर एक अनजान सी शक्सियात जिसका नंबर सेव करने में वक्त नहीं लगता।  कहीं ना कहीं इश्क़ तो है ही। प्रेम की व्याख्या के ऊपर ना जाने कितने ही दर्शन बने हुए है , कबीर, सुर, मीरा, जायसी, खुसरो को सुनिए एक नई  तस्वीर उभरेगी प्रेम की। प्रेम कथाओं में प्रेम कभी व्यक्तिगत हो जाता है कभी सार्वभौमिक , लेकिन होता है प्रेम ही।  मेरा मानना है , प्रेम एक स्वभाव है , चरित्र की विशेषता।  जैसे कुछ लक्षण हमारे व्यक्तित्व को परिभाषित करते है वैसे ही प्रेम एक लक्षण होता है।  हालांकि मेरा ये कहना कि अगर आप किसी एक से प्रेम करेंगे तो वो लक्षण का हिस्सा और आपकी व्यक्तित्वा का हिस्सा तभी हो सकता है जब  आप सभी से प्रेम करते होंगे ।  लक्षण में यदि और यद्यपि नहीं होता।  प्रेम में मिलावट संभव नहीं है। मै जिस प्रेम की बात कर रहा हूँ वो हो सकता है तथ्य आधारित या व्यावहारिक नहीं है , लेकिन जिसको हम प्रेम कहते है वो भी तो प्रेम नहीं है।  बस प्रकट करने के लिए एक संज्ञा चाहिए तो हम प्रेम बोल देते है।

ये लेख मेरे लिए एक आवश्कता थी।  कुछ बातें मेरे प्रेम के सन्दर्भ में।  नीरज कहते थे - "प्रेम को अमरत्व देने के लिए आदमी स्वयं को सदा छलता रहा " हाँ मै  मानता हूँ नीरज के इस कथन को। कभी - कभी स्थायी बनाने के लिए,स्थिरता देने के लिए रिश्तों में हम इतना खाद संभल दे देते है कि पौधे की व्यापकता को देखने के लिए वक्त नहीं बच पाता। जो मेरे तुम्हारे पास है इक्षिता  वो तो यही दो तीन लम्हें है जिनको मानों तो सादिया है , ना मानो तो दो पल।  बाकी  यादों का है , या तो उन्ही दो लम्हो की व्यापकता में प्रेम ढूंढो या स्थिरता देने की यात्रा में चल पड़ो।  ये यात्रा ना केवल थकाने वाली है बल्कि अंत में वही दो लम्हे मिलने वाले है यकीं करो।

क्या प्रेम हमारी जरुरत  है ? यहाँ बचने के लिए मैंने 'हमारी' का प्रयोग किया है , जवाब मेरा ही होगा , तुम्हे ये जहां फिट लगे कर लेना।  प्रेम मेरे लिए कोई वस्तु नहीं थी, इसलिए ये किस पायदान पे किसके लिए है या होगा पता नहीं।  तुम्हारी संख्या क्या है , तुम किस पायदान पे हो इस से बहस क्या है, बहस बस उन्ही दो लम्हों के लिए है दो व्यक्तियों के लिए , चाहे दो दोस्त हो या प्रेमी। उन्ही दो लम्हों में ताकत होती है पूरी कायनात को मनमुताबिक शक्ल देने की। मेरे लिए प्रेम वही दो लम्हा है।  ना कोई नाम , ना रिश्ता ना वो इंतज़ार जो किया करता था। प्रेम कभी कभी मेरे लिए एक कविता है, दो पल में बुनी , दो पल में पढ़ी -समझी  गई और फिर बन गई उसी दो पल का हिंसा। पुराने ज़माने में जब कवि लिखते थे तो वे ईश्वर से या कला की देवियों (अलग – अलग सभ्यताओं में अपनी परम्परा के अनुसार ) से संवाद करते हुए अपनी कविता लिखते थे. बाद में ऐसा हुआ वे कविताएँ संवाद तो रही लेकिन उसमे कई और कई लोग जुड़ गए, जैसे सम्बन्धी, प्रेमी, गुरु, समाज या खुद कवि का अदर सेल्फ (अल्टर इगो), आदि. फिर भी विराट सत्ता जिसे आप आम भाषा में ईश्वर कह लें और प्रेमी को सम्बंधित कविताएँ अधिक रही. अगर कविता कवि की ध्वनि है तो किसी को संबोधित होगी. जो उसे प्रिय होगा, जो करीब होगा कवि उसे ही संबोधित करेगा, इस हिसाब से  प्रेम एक सूत्र है, जो जीवन भर में मिले कई अनुभव एक धागे में पिरोने में मदद करता है. लेकिन कविताओं में सिर्फ प्रेम नहीं होता  बल्कि समकालीन समाज, राजनीति और दर्शन से जुडी कई बातें होती हैं. मुख्यतः एक अनुभव जो स्वयं जीवन जितना बड़ा है, होता है।  ये अनुभव और कुछ नहीं वही दो पल है। मेरे लिए पूरी कायनात वही दो पल है जो मैंने तुम्हारे साथ बिताए है।  वही प्रेम भी है , रिश्ता भी और सत्य भी। 

स्मृतियों पे प्रेम और रिश्ते को ज़िंदा रखना कठिन होता है।   

सौरव कुमार सिन्हा 

Wednesday, 12 September 2018

घुमक्कड़ों की टोली पहुंची मुक्तेश्वर ( 8 से 10 सितम्बर 2018 )

घुमक्कड़ों की टोली पहुंची मुक्तेश्वर ( 8 से 10 सितम्बर 2018 )

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वो बंजारा भी जीने का अजब अंदाज रखता है
जो इतना दर-बदर होते हुए भी बेघर नहीं लगता  

नईम अख्तर बुरहानपुरी साहब का ये शेर शायद खुद में काफी है नीचे लगे फोटो की तर्जुमानी के लिए। हर एक यात्रा मेरे लिए हमेशा एक नई किताब की तरह होती है जिसके हर पन्ने में  अनुभवों का भण्डार होता है शब्दों के आगे पीछे और बीच में ना जाने कितने किस्से छुपे होते है। वैसे ही एक नई किताब सामने आई मुक्तेश्वर यात्रा जो उत्तराखंड के नैनीताल जिले में कुमाऊँ की पहाडियों में २२८६ मीटर (७५०० फीट) की ऊँचाई पर स्थित है।मौक़ा दस्तूर और प्रबंध का सारा जिम्मा का था हालांकि पहली मुलाक़ात में ही मेहमानी और मेजबानी की दूरिया मिट गई।  नए दोस्त , गीतों और गजलों से भरी गुलाबी ठण्ड के बीच महफ़िलें , साथियो के अनुभव और ना जाने क्या क्या। कुछ साथियों का परिचय देना जरुरी है , निशांत एक वीडियो ब्लौगर है और भारत भ्रमण कर चुका है। नीलिशा बिजनौर से आई थी और पकिया घुमक्कड़ है। प्रीतम और आर्का दास पश्चिम बंगाल का नेतृत्व कर रहे थी , प्रीतम ने एवरेस्ट बेस कैम्प की यात्रा इस साल।  इसी बेस कैम्प को जॉनी ने भी कवर कर रखा है और वो हरियाणा से है। अवंतिका दिल्ली से थी और यात्रा का जूनून उनके अनुभवों में झलकता है।  साहिल के अनुभव दिल को छू गए , सतत पर्यटन के लिए वो काफी काम कर रहे है और आप उनकी यात्राओं के बारे में ghoomakad.in से जान सकते है।  मेजबानी का जिम्मा Club ten pine lodge और खास कर प्रजापति जी और आशीष के कंधे पे था।  मोहित स्वभाव से अनुभवी और हल्द्वानी का प्रतिनिधित्व  कर रहे थे। आकाश इटावा से है और उनकी चुलबुली हरकतों ने माहौल को स्वस्थ बना रखा। जॉय से पहले भी  दिल्ली के कई इवेंट्स में मुलाकात हो रखी थी और उनका अनुभव "फ़ूड ब्लॉगिंग " के क्षेत्र में काफी अच्छा है।  

भालूगढ़ जलप्रपात और मुक्तेश्वर मठ की यात्रा अविस्मरणीय रही।  लेकिन यात्रा के अलावा जो बात पुरे दौरे को यादगार बनाती है वो है Club 10 Pine Lodge और इस होटल के मालिक धीरज जी की मेहमानवाज़ी। देश के लगभग सभी हिस्सों को  घुमा है। अगर किसी चीज की तलाश एक यात्री को होती है तो वो होता है गर्मजोशी से ओत प्रोत करने वाली मेहमानवाज़ी। 

इस यात्रा की शुरुआत दिल्ली से हुई और हम NH-24 से होते हुए गढ़ मुक्तेश्वर , मुरादाबाद ,हल्द्वानी पार करते हुए मुक्तेश्वर पहुंचे। रास्ते में एक दूसरे के अनुभवों को सुनना बहुत आनंददायक था।  एक यात्री आपको बैठे बैठे पूरी दुनिया की सच्ची सैर करा सकता है , और हम तो १२ थे।  Club 10 Pine Lodge को जिस बारीकी और मोहब्बत से बनाया गया है वो आपको मोहित कर लेगा। इसी मनमोहक फ़ज़ा के बीच रात को महफ़िलों का जो लुत्फ़ आया उसपर पूरी किताब लिखी जा सकती है। गीता दत्त से ले कर आतिफ तक का सफर हम सभी यात्रियों ने मिल कर लिया।  हमारे सुर हर एक शख्सियत के अनुभवों के तान पर थे। Club 10 Pine lodge के बारे में अगर आपको और जानना है तो आप नीचे दिए लिंक्स पे जा  सकते है।  







''सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहाँ?
जिंदगी गर कुछ रही तो नौजवानी फिर कहाँ?''

दुनिया में मनुष्‍य-जन्‍म एक ही बार होता है और जवानी भी केवल एक ही बार आती है। साहसी और मनस्वी तरुण-तरुणियों को इस अवसर से हाथ नहीं धोना चाहिए। कमर बाँध लो भावी घुमक्कड़ो! संसार तुम्‍हारे स्वागत के लिए बेकरार है।









Monday, 20 August 2018

टाइम पास नोट्स

उस रात कोई एक शुक्राणु टकरा गया था प्रकृति के नियमानुसार मादा के किसी अंडे से और जन्म मरण की प्रक्रिया शुरू हो गई , नियति लिख दी गई , भाग्य मढ़  दिया गया, भविष्य गुंथा जाने लगा।  लेकिन किसका? प्रकृति और पुरुष दोनों नहीं जानते थे कि वो "हादसा" ( आप उसे घटना भी कह  सकते है ) जन्म देगा "मै "  को जो २०१८ में ये लेख रहा होऊंगा। नियति सिद्ध नहीं होती लेकिन आज "मै " एक सत्य है और उसके अलावा सब एक घटना है।  होने की प्रक्रिया के साथ होता गया हादसा।  हर घटना को हम नाम देते गए और जुड़ते गए घटनाओं को , दूर होते गए एक मात्र सत्य "मै " से।  तुम भी एक घटना हो जैसे  एक घटना है शुक्राणुओं का टकराना और  बना देना किसी को माता किसी को पिता और तुम्हे मेरा इश्क।  सत्य तुम्हारा "मै " है और मेरा "मै " तो बस बातचीत हो दोनों सत्य के बीच।  सत्य को सत्य से जोड़ो तो सत्य ही बनता है , थोड़ा भी झूट हो तो सत्य सत्य नहीं रहता , एक हादसा हो जाता है , एक घटना हो जाती है।  मेरी समझ से सत्य को सत्य से जोड़ना ही प्रेम है , इबादत है पूजा  है।  किसी का शेर है

जिस्म से रूह तक जाए तो हकीकत है इश्क,
और रूह से रूह तक जाए तो इबादत है इश्क़।

यहां जिस्म एक माध्यम है लेकिन अगर रूह तक जाए तभी वी सत्य है अथवा घटना।  तुम समझ रही हो ना ? घटना से अपने आप को मत जोड़ो सत्य ही असली नियति है उसकी खोज जारी रखो।

Monday, 13 August 2018

तुमसे डर क्यों लगता है ?

तुमसे डर क्यों लगता है ? ये सवाल तुमसे नहीं है, खुद से है।  शायद खुद से इसलिए क्योकि इसका जवाब तुम तो नहीं दोगी इसलिए दारोमदार खुद के कन्धों पे देना होगा।  मौन हर वक़्त तुम्हारा जवाब नहीं होता लेकिन तुम वो भी तो नहीं कहती जो कहना चाहती हो इसलिए खुद से साक्षात्कार ही सही लगता है। तुमसे डर खोने का डर नहीं है , तुमसे इश्क़ पाने के लिए नहीं है।  तुमसे दोस्ती एक वजह नहीं है ना आदत है , ना जूनून भी , बस है , क्यों है कारण क्या है पता नहीं ना मैंने खोजा है ना जरुरत लगती है । तुम्हारी आँखों में भी पाने और खोने की उम्मीद नहीं देखि मैंने।  सुकून लगता है इस माहौल में तुम्हारे साथ बैठना , चाय पीना और ये जानते हुए भी की बिछड़ना नियति तो है लेकिन हमारे रिश्ते में अब इसका कोई महत्व नहीं है। 

लेकिन फिर भी डर लगता है।  डर उन आंखों से नहीं है , उन चाहतों से नहीं है , उन लम्हों से नहीं है जिन्होंने सदियों का दुःख तुम्हारे दामन में बेवक्त लगा दिया। डर तुम्हारे अनजाने मौन का है। तहज़ीब हाफ़ी का एक शेर

मैं उस को हर रोज़ बस यही एक झूट सुनने को फ़ोन करता
सुनो यहाँ कोई मसअला है तुम्हारी आवाज़ कट रही है। 

ये शेर लगभग उसी दायरे की और सूचित करता है जो मेरे और तुम्हारे रिश्ते के बीच है।  होनी भी चाहिए , रिश्तों में दुरी सही होती है , मै ही पागल हूँ जो दोस्ती, यारी , आती जाती मोहब्बतों के दरम्यान दुरी मिटाने की कोशिश करता है।  खुसरो कहते थे
साजन हम तुम एक हैं और कहन सुनन को दो 
मन से मन को तोलिये सो दो मन कभऊ ना हो

मेरे लिए हर रिश्ता "दो मन कभऊ  ना हो" है।  मुझे फर्क नहीं पड़ता निभाने वाला क्या सोचता है , मै तो खुसरो का मुरीद हु, ना मानना ज्यादती होगी।  डर इसी बात का लगता है , मन कहीं दो तो नहीं है।  

फुटकर नोट्स 

Sunday, 24 June 2018

बोलती रहो.......


बोलती रहो.......
क्यों ?
तुम बोलती हो तो
ध्यान तुम्हारा कहीं और होता है
अच्छा , इस से तुम्हे क्या ?
मेरे ध्यान से तुम्हारा ध्यान
टकराता नहीं है
मेरे मार्ग में बाधक नहीं बनता
किस मार्ग में ?
पता नहीं
मेरे पैरों को सिरहाने बना
जब तुम आकाश को निहारती हुई
अपनी यादों में से शब्द निकालती  हो
तो ऐसा लगता है जैसे
तुम्हारी आँखों के रास्ते एक मार्ग है
जो सुदूर आकाशगंगा में
मेरे लिए अभी , बस अभी बना है
वही मार्ग
वहा अकेले जाओगे ?
हाँ

Monday, 12 March 2018

क्या आप अपना केस लड़ने में आर्थिक और कानूनी रूप से असमर्थ है ? Advok8 करेगा आपकी मदद

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने वकालत के पेशे के व्यावसायीकरण पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि अब अदालत में कानूनी लड़ाई लड़ना इतना महंगा हो गया है कि यह गरीब आदमी की पहुंच से बाहर हो चुका है। शीर्ष अदालत के अनुसार न्यायिक प्रक्रिया इतनी धीमी है कि लोग अब इस बात से आश्वस्त हो गए हैं कि मुकदमा उनके जीवनकाल में खत्म नहीं होगा। न्यायमूर्ति बीएस चौहान और न्यायमूर्ति एसए बोब्डे की खंडपीठ ने कहा कि वकालत को कभी कुलीन पेशे के रूप में जाना जाता था लेकिन मौजूदा दौर में यह पेशा व्यावसायिक आश्वासन में तब्दील हो गया है। 

न्यायाधीशों ने कहा कि न्याय प्रशासन में न्यायाधीशों के साथ ही वकीलों की समान भागीदारी होती है और वकील संदिग्ध व्यक्ति या सिर्फ मुकदमों के सहारे ही जीवन यापन करने वाले व्यक्ति जैसा आचरण नहीं कर सकते हैं। वकील द्वारा जानबूझ कर वादकारी के हितों की अनदेखी करना एक वकील के अनुरूप नहीं है।

 कानून व्यापार नहीं है। एक वकील अदालत का अधिकारी है और इस नाते उसका यह कर्तव्य है कि वह सुचारू ढंग से न्यायालय का कामकाज सुनिश्चत करे। वकील को संकट में घिरे व्यक्ति की उम्मीदे जगानी होती हैं और वह असहाय वादी का शोषण नहीं कर सकता है।

शीर्ष अदालत ने मुकदमे को लंबा खींचने और बहस के लिए दूसरे वकील की सेवायें लेने जैसी गतिविधियों पर भी प्रतिकूल टिप्पणी की और कहा कि यह तो वादी को अपने जाल में फंसाने जैसा हुआ जो नैतिक रूप से और पेशेगत दृष्टि से ठीक नहीं है।

लेकिन अब इन समस्याओं का निदान संभव है , अगर आप अपना केस लड़ने में आर्थिक और कानूनी रूप से असमर्थ है तो आपकी मदद करेगा advok8.in Third party litigation funding के द्वारा ना केवल वो आपकी कानूनी रूप से सहायता करेगा बल्कि आर्थिक मदद करेगा।  के मार्केटिंग हेड सौरव कुमार सिन्हा का कहना है  कि हमारा लक्ष्य देश में लोगो को कानूनी रूप से जागरूक एवं सजग करना है।  अपने एप के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा की अभी तक 10000  से ज्यादा वकील उनके साथ जुड़ चुके है और एप पे दी जाने वाली टेक्नोलॉजी  से वकीलों की कार्यक्षमता में बढ़ावा हुआ है और उनका काम पहले से ज्यादा सुचारु रूप से चल रहा है।  

कंपनी के फाउंडर कुंदन कुमार ने इस बात पे जोर डाला की उनका प्रोजेक्ट जटिल प्रक्रिया को सरल बनाना और भविष्य में लीगल इंशोरेंस और लीगल काल सेंटर जिससे दर्ज केसों की संख्या में गिरावट आने  पे केंद्रित है। उन्होंने बताया की दीपक गोयल जो की एक एंजल इन्वेस्टर है से उन्हें सीड फंडिंग मिल चुकी है और आने वाले दो महीनो में राउंड A की संभावना बड़ी प्रबल है।  केवल १५ दिनों के अंतराल में 70 से ज्यादा केसेस दर्ज हो चुके है और काम  जारी है।  अगर आपको इस विषय पे जानकारी चाहिए तो आप +91 -7838304699 पे संपर्क कर सकते है या info@advok8.in पे मेल भेज सकते है।  



Sunday, 29 October 2017

मिलने की घड़ी जब आ जाती है

मिलने  की घड़ी जब आ जाती है 
कुछ खुशबु सा महका जाती है 

वो फिर भंवरा बन कर उड़ता है 
तू जिसकी गली मंडरा जाती है 

हाय ! कयामत क्यों ना बरसे 
तू थोड़ा जो शरमा जाती है 

वो तो बस एक शीशा है 
तू खुद से क्यों घबरा जाती है 

उफ्फ ! तेरे घुंगराले बाल 
उसे देख देख बदरा छाती है 




Thursday, 17 August 2017

सेल्फी स्वैग कैफे : कॉफी कल्चर की दुनिया में एक अनूठा प्रयोग

सेल्फी”, एक ऐसा फीवर जिससे आज के वक्त में बच्चे से लेकर बड़ों तक कोई भी अछूता नहीं रह गया है। अपनी सेल्फी क्लिक कर सोशल मीडिया पर पोस्ट करने वालों की भरमार है। आपने भी अपने आस-पास देखा होगा या फिर आपको खुद भी सेल्फी का क्रेज जरूर होगा सेल्फी का फीवर पूरी दुनिया को अपने गिरफ्त में किए हुए है. बिरले ही कोई ऐसा शख्स होगा जिसे सेल्फी जैसी चीज से परहेज हो।  खुद को कैमरे में कैद करने की इस कला का हर एज ग्रुप दीवाना हो चुका है। अगर यही सेल्फी आपको अपनी कॉफी के झाग के ऊपर मिले तो आपको कैसा लगेगा ? है ना अचरज की बात? इसी अचरज को सच कर दिखाया है अनित डैंग और आशित मेहरा ने।  भारत के सबसे बड़े मॉल , डी एल एफ माल ऑफ इंडिया के दूसरे माले पे स्थित ये सेल्फी स्वैग कैफे  कॉफी कल्चर की दुनिया में एक अनूठा प्रयोग है।  आप अपनी सेल्फी ले कर काउंटर पर दे देते है और जब कॉफी आपके सामने आती है तो उसके ऊपर आपका दिया हुआ सेल्फी होता है।  

लेकिन बात सिर्फ सेल्फी की  नहीं है।  इस प्रयोग के साथ खाने के स्वाद और कॉफी की गुणवत्ता का भी ख़ास ध्यान दिया गया है।  आप अनेक तरह के सैंडविच के साथ इस कॉफी का मजा ले सकते है।  ख़ास बात ये है कि ये सेल्फी आपको कॉफी के अलग अलग फ्लेवर्स के साथ भी  मिल जाएगी। लोगों के बिच ये प्रयोग खासा सफल हो रहा है और खासकर युवा वर्ग इसे ले कर बहुत उत्साहित है। अनित डैंग और आशित मेहरा का अगला लक्ष्य इसे देश के कोने कोने में पहुंचाना है।  

Saturday, 13 May 2017

डर तो है

डर तो है
दरवाजे के पीछे से आती हुई आहट का
डर उस सवाल का है
जब सामना होगा।
आहट जब शक्ल लेगी
उस शख्स का
जो करीब है
मुझे जानना चाहता है
और वो उस सवाल के लिए ही
आहट से निकल कर
शक्ल अख्तियार कर रहा है।
दरवाजा अब तक दरवाजा नहीं था
एक लक्ष्मण रेखा थी
जो खुद मैंने राम बन
मिटा डाली , मर्यादा हरण कर डाली।
मुझे डर है उन आँखों में आंखे जब होंगी
तो क्या सवाल केवल सवाल का होगा
या मेरे उसके दरम्यान मौजूद
हर उस सफ़ेद झूठ का
जो शायद अब
नए वक्त में
एक सवाल बन जाएगा।
मै जानता हु अंततः क्या होगा
अपने जवाबों को रिवाजों का कम्बल ओढ़ा कर
सुला दूंगा चुपचाप
वो शक्ल फिर आहाट  बन जाएगी
मै फिर राम
और खींच जाएगी फिर एक लक्ष्मण रेखा।



Friday, 28 April 2017

ललका गुलाब





भोजपुरी मने खाली बगल वाली जान मारे ली नइखे, ई दुर्भाग्य के बात बा कि अइसन मधुर भासा के खातिर अपनहि समाज में लोगन के मन में दुर्भावना बा। हम भोजपुर प्रदेश के नइखी तबहु भोजपुरी खून में बा अउर खून खउल जाला जब केहू भोजपुरी खातिर अप्सब्द इस्तेमाल करेला। इ हो बात सही बा कि सार्थक प्रयास ना कइल गइल ह। अमित जी के बहुत बहुत बधाई ललका गुलाब खातिर  ई प्रयास जारी रहे 

Friday, 21 April 2017

इतना भी आसान नहीं है जॉन तक पहुंचना : जॉन एलिया मेरी नज़र में

कोई मुझ तक पहुंच नहीं सकता , 
इतना आसान है पता मेरा।  

जॉन को चाहने वालों की संख्या लाखो में है और रोज उनकी तादात बढती जा रही है।  देवनागरी में जब से जॉन के कलाम आए है, उनके मुरीदो को ज़ियादा सहूलियत मिली है खासकर हिन्दुस्तान में।  युट्यूब पे जॉन पर काफी कुछ मौजूद है, लोग ने अपने अपने हिसाब से इस अज़ीम शायर को पढ़ा और समझा। मै भी उन्ही मुरीदो में से एक हु और जॉन को पढ़ता रहता हु।  मेरे पास कोई ऐसी डिग्री नहीं है जिससे साबित हो कि क्या वाकई में मेरे अहसासात जो जॉन को लेकर है उनमे कितनी सच्चाई है और हो सकता है यही एक कारण हो जो मेरे लेखो को पक्षपाती नहीं बनाता है क्योकि मैंने जॉन के सिर्फ और सिर्फ एक पाठक के रूप में देखा पढ़ा समझा और लिखा। आप भी कोई राय कायम ना करे बस पढ़ते रहे।इस बात में भी दो राय नहीं है कि यही वो वक्त है जब जॉन की शायरी पे सही गलत जो भी हो लिखा जाएगा, ये काम शुरू हो भी चुका है।  इसी सिलसिले को आगे बढ़ाने की मेरी एक कोशिश है।    

जॉन की शायरी जिस कदर रोज़ - रोज़ सोशल मीडिया पे पढ़ने को मिलती है उससे ये तो यकीं है कि लोग जॉन को पढ़ रहे है और पसंद भी कर रहे है लेकिन क्या जॉन का पूरा वजूद उन शायरियो के आस पास ही है? क्या जॉन की झुंझलाहट ही जॉन के चाहने वालो को उनके पास लाती है ? क्या जॉन का अंदाजे बयां ही था जो उन्हें और शायरों से जुदा करता है ? क्या कारण था उनकी झुंझलाहट का ? मुझे  लगता है जॉन एक शक्शियत है जिसे शायरी के मेयार-ए -ख़ाम से बाहर निकल कर देखना होगा। सिर्फ चंद शेर और कुछ वाक्यात जॉन की तर्जुमानी नहीं कर सकते। जॉन के कई शेर आशिको और कामरेडो की डायरियों में मिल जाएंगे। 'रोमैण्टिसिज़्म' और 'रेसिस्टेन्स' का भरपूर मिश्रण थे , लिकेन एक और जॉन था , दिवार के पीछे जो बाहिर आना ही नहीं चाहता था वो पीछे रह कर ही तंज करना चाहता था खुद पर भी और जमाने पर भी और इसी जॉन की मुझे तलाश है।

जॉन एलिया के लिए कही गई पीरजादा क़ासिम की एक गज़ल के कुछ शेर जिससे मै अपनी बात शुरू कर रहा हु। ये गज़ल खुद में जॉन की शख्सियत के विषय में कुछ बाते बखूबी कह देती है    

ग़म से बहल रहे है आप, आप बहुत अजीब है 
दर्द में ढल रहे हैआप, आप बहुत अजीब है 

अपने खिलाफ फैसला खुद ही लिखा है आपने 
हाथ भी मल रहे है आप, आप बहुत अजीब है 

वक्त ने आरजू की लौ देर हुई बुझा भी दी 
अब भी पिघल रहे है आप,आप बहुत अजीब है 

ज़हमते जर्बते दीगर  दोस्त को दीजिये नहीं 
गिरके संभल रहे है आप, आप बहुत अजीब है  

दायरावर ही तो है इश्क के रास्ते तमाम 
राह बदल रहे है आप आप बहुत अजीब है 

दश्त की सारी रौनके ख़ैर से घर में है तो क्यू   
घर से निकल रहे है आप, आप बहुत अजीब है 

अपनी तलाश का सफर ख़त्म भी कीजिये कभी 
ख्वाब में चल रहे है आप, आप बहुत अजीब है 


जॉन के शेर कहने का अंदाज और उनकी शायरी में झुंझलाहट एक बहुत बड़ा कारण है उनके चाहने वालों को उनके पास पहुंचाने का।  ज्यादातर लोग मुशायरों में उनके अंदाज को देख कर ही उनकी और आकर्षित होते है। जॉन के पहले भी कई शायर थे जिनका अंदाज लोगों को याद होगा जैसे आदिल लखनवी लेकिन जॉन की निजी जिंदगी भी उनके अंदाज से मेल खाती थी, बेतकल्लुफ, बेफिक्र और बुलंद ।  जॉन एलिया जरुरत से ज्यादा सेंसेटिव ( हस्सास ) थे इसलिए किसी भी वाक्ये पे उनका रिएक्शन आम लोगो या दूसरे अदीबो से जुदा होता था।  हालांकि कमोबेश सभी कलाकार या कला के चाहने वाले सेंसेटिव होते है लेकिन झुंझलाहटों  को जब्त कर लेते है कारण वो सामाजिक और व्यक्तिगत बेड़िया जिनमे वो बंधा हुआ होता है।  जॉन आजाद थे इन बेड़ियों से इसलिए उस झुंझलाहट को उसी अंदाज में पेश करते थे जैसा वो महसूस करते थे। जॉन का शायर होना उनकी पारिवारिक पृष्टभूमि की वजह से था लेकिन उनके पिता शफ़ीक़ हसन एलिया ने उनको शायरी के अलावा कई ऐसी विधाओं से अवगत कराया जिसको जॉन ने ना केवल पढ़ा लेकिन ताउम्र उन फलसफ़ो पे चलते भी रहे। उनसे बड़े दो भाई रईस अमरोही और सैय्यद मोहम्मद तकी उस समय उर्दू अदब के प्रतिष्ठित नाम बन चुके थे।  इस संगत और माहौल का एलिया पर भी खूब असर पड़ा होगा क्योंकि कहा जाता है कि उन्होंने अपना पहला शेर आठ साल की उम्र में ही कह दिया था।  इसका बहुत बड़ा कारण उनका शिया मुसलमान होना भी है जहां मजलिसों की पुरानी रवायात है और साथ साथ उनका अमरोहा में होना जिसके बारे में सयाने कह गए है कि अमरोहा में बच्चा भी रोता है तो तर्रनुम में। अब किसी की परवरिश इस माहौल में हो तो शायरी तो उसके रगों में होगी ही हालांकि जॉन दो कदम आगे निकले। जॉन का मानना था कि किताबों को पढ़ के अगर अमल ना किया गया तो वो ना पढ़े के बराबर होता है। प्रोग्रेसिव पोएट्री और जमाने के बदलते दौर में उन फलसफ़ो  पर अमल करना बहुत कठिन था , जॉन ने अमल किया। उनकी नज्म के कुछ हिस्से,

मेरे कमरे में किताबो के सिवा कुछ भी नहीं 
इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर

इन में इक रम्ज़ है , इस रम्ज़ का मारा हुआ ज़हेन
मुशदा ए इशरत ए अंजाम नहीं पा सकता
ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता !

मेरे कमरे का क्या बयां की जहां 
खून थूका गया शरारत में 


ये एक नज़्म ही काफी है उनका इल्म और किताबों के प्रति बेकरारी और चाहत को दर्शाने के लिए।  लोग कहते है कि ये फ़न उन्हें विरासत में मिला था, ये दीगर बात है कि जॉन ने बड़े शिद्दत से उन फलसफ़ो पे अमल किया जिसमे केवल विरासत का हाथ नहीं हो सकता । इस रवैये के कारण समाज का दंश झेलना तो लाजिम था। जॉन को झुंझलाहट थी की कोई उनको समझा नहीं सकता उनके सिवा।  उनका ये अकेलापन और अपने आप से गुफ्तुगू शायरी में मुकम्मल तौर पे झलक के सामने आती है। जॉन की शायरी में लेकिन इस अकेलेपन से पैदा होने वाली बेचारगी के बजाय एक किस्म की बेफिक्री दिखती है और जो सोशल मीडिया पर मौजूद आशिकों को खूब भाती है।  

जॉन का जिक्र आप किसी से करे आपको पाकिस्तान या हिन्दुस्तान नज़र आए ना आए, अमरोहा ज़रूर नज़र आएगा। जॉन जब कहते है

शहरे -ग़द्दार जान ले की तुझे 
एक 'अमरोहवी' से खतरा है

अपने छोड़े हुए मुहल्लों पर
रहा दौराने-जांकनी कब तक
नहीं मालूम मेरे आने पर
उस के कूचे में लू चली कब तक.

जाइये और ख़ाक उड़ाइये आप
अब वो घर क्या कि वो गली भी नहीं 

और भी बहुत सारे उदहारण हो सकते है जो जॉन का अमरोहा के प्रति बेइन्तेहाई प्रेम दर्शाते है।  २३ साल की उम्र में हालात ने जॉन को अमरोहा से तो अलग कर दिया लेकिन अमरोहा को जॉन से अलग नहीं कर पाए। पूर्वी उत्तरप्रदेश में बोले जाने वाले देसज/देसी  शब्दों का इस्तेमाल आप जॉन की शायरी में देख सकते है। जानकारों ने ये जरूर कहा है कि बहुत ज्यादा छूट होती नहीं है इस शायरी के फन में लेकिन अकबर इलाहाबादी , इब्ने इंशा जैसे शायरों ने भी इस्तेमाल किया और बखूबी किया , जॉन चुकी चलत फिरत की बातचीत को शेरो में ढाल देते थे इसलिए उनके लिए बेहद जरुरी था ऐसे शब्दों को इस्तेमाल करना और उन्हें ज़िंदा रखने के लिए बड़ी खूबसूरती से इस्तेमाल करना।  अब बात उसी अमरोहा की, जॉन के भाइयों का कम्युनिस्ट पार्टी से मुस्लिम लीग में जाना एक बड़ा कारण था कि जॉन अमरोहा छोड़ पाकिस्तान चले गए लेकिन जैसे कि मैंने कहा , अमरोहा से उन्हें बेइन्तेहाँ मोहब्बत थी सो वही झुंझलाहट आपको शायरी में बहुत ही बेमिसाल तरीके से दिखेगी। बहुत से शायरों कहानीकारों ने बंटवारे की दास्ताँ को बखूबी दर्शाया है , और काफी मार्मिक ढंग से भी लेकिन जॉन का अंदाज उस तकसीम को ले के भी  जुदा था। धार्मिक कट्टरता पे उनका लहज़ा बिलकुल कबीर की तरह था , हालांकि कबीर की तरह व्यापक नहीं था फिर भी उन्होंने किसी का बचाव नहीं किया, चाहे मंदिर हो या मस्जिद। जब वो 'इस्टैब्लिशमेंट' पे हमला करते है तो खुद को भी एक 'इस्टैब्लिशमेंट' मान कर बखूबी तंज करते है , वो जानते है कि खुद वो एक 'इस्टैब्लिशमेंट' का हिस्सा है और चाहे अनचाहे उन्हें इसका साथ देना पड़ रहा है, ऐसा बहुत कम लोगों ने किया।    

धरम की बांसुरी से राग निकले 
वो सुराखों के काले नाग निकले, 

रखो दैरो-हरम अब मुक़फ़्फ़ल
 कई पागल यहां से भाग निकले, 

वो गंगा जल हो या आबे-ज़मज़म 
ये वो पानी हैं जिन से आग निकले

है आखि़र आदमियत भी कोई शै 
तिरे दरबान तो बुलडॉग निकले


जॉन की शायरी को ले बहुत सारे जानकार ये कहते हुए नज़र आएँगे कि  शेरों में बहुत ज्यादा गहराई, मार्मिकता, सघनता की चाह रखने वालों को जॉन निराश कर सकते है।  कुछ हद तक मै भी ये मानता हु , लेकिन अभी तो उस किताब का खुलना चालु हुआ है जिसका नाम है जॉन एलिया , ना जाने कितने नए पहलू है जो देखने को मिले। 


Thursday, 9 March 2017

कायस्थ समाज :भाजपा का पारम्परिक वोट बैंक (एक अतिवादी का पोस्ट)

इस पोस्ट को लिखने के बाद हो सकता है चित्रांश समिति मुझे किसी भी समारोह में ना बुलाए लेकिन मुझपर ना बुलाने का फर्क उतना ही पडेगा जितना चित्रांश समिति का कायस्थ समाज पे पड़ता है l जैसा की मैंने लिखा है, कायस्थ समाज भाजपा का पारम्परिक वोट बैंक है , चाहे उम्मीदवार कोई भी हो ट्रैक रिकार्ड कैसा भी हो, बटन कमल पर ही दबता हैl ये पोस्ट और भी जातियो के लिए हो सकती है लेकिन कायस्थ समाज जो अपने आप को सबसे ज्यादा पढ़ा लिखा और जिम्मेदार वर्ग समझने का दम्भ पालता है उसको ये आइना दिखाना तो बनाता ही है क्योकि जिस प्रकार के उम्मीदवार भाजपा लगातार मैदान में उतार रही है और उसे इस समाज का समर्थन भी मिल रहा है उससे ये लगता है कि बुद्धिजीवी होने का जो दम्भ है वो केवल दम्भ ही हैl अब इसके कारण क्या हो सकते है? ब्राह्मणवाद अगर नष्ट हो जाएगा तो उसका फर्क सीधे तौर पे इस समाज को पडेगा क्योकि यह समाज उत्पत्ति से ही ब्राह्मणवाद और सामन्तवादी प्रथाओ का समर्थक रहा है और इसमे कोई दो राय नहीं है कि भाजपा इन दोनों विचारधाराओ को सहेजने वाली आखिरी पार्टी हैl दूसरा कारण कमजोर नेतृत्व का भी हो सकता है और उन्हें अपनी छवि और पैठ बचाने वाले सिर्फ भाजपाई ही दिखाई देते है जो सर्विस क्लास के हको के पक्षधर है या दिखाई देते हैl मझे इसमे कोई परेशानी नहीं है कि पूरी जाती केवल भाजपा को वोट दे, मुझे परेशानी उन तमगो से है जिन्हें ढोते हुए वो ये वोट देते हैl उप्र में कायस्थ वोट लगभग 3 प्रतिशत है जो एकतरफा मतदान भाजपा की और करता है और प्रचार करता है अपनी तथाकथित बौद्धिकता के बल पर कि फलां लोग एकजुट होकर मतदान करते हैl अगर ये गणित केवल हारने और जितने के लिए ही लगाईं जाती है तो एक जाती जो शिक्षा और उसके प्रचार प्रसार में अग्रणी रही है का ऐसा करना मूर्खतापूर्ण कदम है lउम्मीद है कायस्थ समाज केवल दुसरो पे जाती वदी होने का आरोप ना लगाए और अपने अंदर झाँक के उस धरोहर को टटोले जिसके कारण उन्हें पहचान मिली है l

Saturday, 3 December 2016

तुम मेरी ज़बान हो गई हो

तुम मेरी ज़बान हो गई हो
तीर की कमान हो गई हो 

मेरे रात के अंधेरो के लिए 
सुबह की अज़ान हो गई हो 

बादलो से ख़ौफ़ खाया कर 
रेत का मकान हो गई हो

भाव यूँ बढे की आज तुम
कीमती सामान हो गई हो



Wednesday, 31 August 2016

स्वीकार करो मन मेरे

स्वीकार करो मन मेरे , 
वो कह रहा है 
और वो जो कह रहा है 
जानता हुं वो नहीं कह रहा है 
फिर भी
स्वीकार करो मन मेरे ,
वो कह रहा है l
लेकिन
वो नहीं कह रहा है
तो कौन कह रहा है ?
उसके मन ने
जिसको स्वीकार किया है l
फिर हम दोनों ?



Friday, 22 July 2016

If you love books, you need to have a library at home !!!

What books mean to the society is above any explanation. Human civilization has always followed foot steps engraved in classics and still we like to take guidance of few immortal creations across various languages of the world to survive,sustain and stabilize. Books have unique charms that cannot be replaced by digitized information.


Many, many studies have been conducted on the health and psychological benefits of reading books. If you spend the time going through the long lists of results, you might just walk away thinking that reading is some sort of super activity, a wonder drug that makes us smarter and healthier. Honestly, you wouldn't be that far off.Every book lover knows and understands the irrational feeling of falling in love with a book at first sight. Sometimes it is a promising title, sometimes it is a gorgeous cover, sometimes it is an interesting blurb at the back promising an unforgettable story, sometimes it is a combination of these. But when it comes to enjoy a book at complete peace. You need a proper ambiance so that you can go through and in between every line that will bring you closer to what the author has intended to.

  I have witnessed as a book lover that almost all the book lovers try to create a library of their own .Studies from 27 countries found that families with books in the home (even as few as 20), had children who attended school between 2.4 years and 6.6 years longer than children who lived in homes without books. The researchers indicated that a library of 500 books provided the maximum educational value.

The study also found that the presence of books in the home had twice as much affect on a child’s perseverance in attending school than the education level of her or his parents.

Having a home library could mean the difference between a child who becomes a doctor and a child who drops out of high school. The data from the study makes it obvious that building a home library — print, digital, or a combination — is essential for long-term academic success for home schoolers.


I just love decorating books and mags where one discovers amazing interiors, which may seem inaccessible, but they always feature great ideas to pickup and reproduce at home. Books can be placed on bricks and boards (most of mine are) or displayed in aesthetically pleasing ways, such as on polished oak shelves (my dream). Durability, visibility, and order are the three cardinal principles of organization for any library.You can follow some of our below products to make a lively library or a sweet reading space at home

You do not want a bookshelf to come crashing down on you. Nor do you want the books themselves to be crushed and creased in such avalanches. The skeleton for your library should be durable. Beware of sagging boards and high stacks of tottering books.


Modern homes are not just about living rooms, the kitchen, bedrooms, the dining space or the bathrooms. While they do constitute the bare minimum, home owners across the world always wish to add an extra dimension to their homes — which not only makes the house unique and special, but also caters to the specific interests of those residing in it. From media rooms to stunning stone fireplaces, every single special element has been put in place to reflect their individual design choices and priorities. The latest and hottest trend is the advent of amazing home libraries.


Thursday, 14 July 2016

जिसने शायरी के फन में अदब को सम्भाल रक्खा है : राजेश रेड्डी

मुशायरे की रवायत सदियों पुरानी है।  पिछले दो दशकों में साहित्य के अलग अलग क्षेत्रो में बदलाव के साथ साथ इसका रूप और रंग भी बदला है।  नए चहरे , नया प्रारूप और लोगो का इसके प्रति बदलता नजरिया ये तो साबित करता हीं  है कि बदलते वक़्त ने मुशायरो की रूह तो नहीं लेकिन उसका आवरण जरूर बदला है। मौजूदा नस्ल जिनके कंधो पे साहित्य का भविष्य निर्भर है , इस बदलाव की समीक्षा नहीं कर पा रही है , और पुरानी पीढ़ी केवल तंज कस रही है और किसी कीमती चीज को खोने का विलाप कर रही है । उसकी रूचि सामंजस्य बिठाने की और नहीं है।  हालांकि ये बात भी सच है कि चाहे वो गज़ल हो गीत हो या कविता , अपना मंच वे स्वयं बनाती है और वे खुद का निम्मित भी है।  साहित्य का सफर किसी भी पीढ़ी का मोहताज नहीं होता , बदलाव अगर गलत होते है तो साहित्य में इतनी शक्ति होती है कि देर से ही सही लेकिन वो पुराने परिधान में आ जाती हैं । इन सबके बावजूद गजल की रूह जिसको एक शरीर तो चाहिए ही संवाद करने के लिए , थोड़ी परेशान नजर आ रही थी।  अगर हम हिंदी उर्दू गजलों को अलग अलग कर दे तो ये परेशानी हिंदी गजलों में व्यापक रूप से दिखेगी ( लेकिन कोशिश रहेगी बात केवल गजलों की हो और उसमे भी मंचो पे पढ़े जाने वाली गज़ल )।  अगर उर्दू वाले हिंदी या अन्य भाषाओं और बोलियों के प्रति थोड़े सख्त हैं तो ताज्जुब नहीं होना चाहिए। पर इतने सख्त पैमाने वाले जानकार भला कितने हैं? 


मेरे जैसे गज़ल के कद्रदान जिनका ज्ञान ८० के दशक से शुरू होता है , आज २०१६ तक अगर उस बदलते रूप की समीक्षा करने की कोशिश करे तो इस नतीजे पर आसानी से पहुंच जाते है कि मुहशयरे भी "फटाफट " ढाँचे में आ गए है। अगर उस सामंजस्य की बात  की जाए तो मेरी नजर में खुमार बाराबंकवी और मजरूह सुल्तानपुरी के बाद गजल की क्लासिकल रवायत ठहराव पर आ गई है। मुशायरो का तौर अब उस क्लासिकी को अनदेखा कर रहा है।  शोर शराबा ज्यादा है और संजीदा नज्मे और गजले बस पुराने ज़माने की आपबीती सी हो गई है ।  मेरे पसंदीदा जॉन कहते थे "दाद-ओ-तहसीन का ये शोर है क्यों हम तो ख़ुद से कलाम कर रहे हैं " । लेकिन मंचो से तालियों की चाह ने इस अदबी फन को  अपने सफर से गुमराह कर  दिया है।  

अब बात राजेश रेड्डी साहब की।  जिस अंदाज का जिक्र मैंने ऊपर किया और जिस सामंजस्य की कमी मेरी नजर में इस गिरते स्तर का कारण है वो सारी कमिया कई दशकों से जनाब राजेश रेड्डी साहब मुशायरो के मंचो से दूर करने की कोशिश कर रहे है। मुझे लगता है की खुमार साहब के बाद गजल की वो क्लासिकी रवायत जनाब राजेश रेड्डी ने ही सम्भाल रक्खी है।  आप अगर खालिस गज़ल सुनने के शौक़ीन है तो राजेश रेड्डी उस लिहाज़ से आपके पसंदीदा होने चाहिए।  इन्होने सिर्फ गजलों को अपनी पूरी कारीगरी समर्पित कर दी है।  तरन्नुम में गज़ल पढ़ने का उनका तरीका आपको गज़ल के उसी रूप के नजदीक ले जाएगा जिसके लिए शायद इसका ईजाद किया गया होगा।  कई प्रसिद्ध गज़ल गायकों ने इनकी गजलों को आवाज  दी है लेकिन वो स्वयं जब गज़ल पढ़ते है तो सुनने वालो पर दोगुना जादुई असर होता है।  अगर गज़ल की बारीकियों की बात करे तो हर लफ्ज में नक्काशी।  मिसरो का चयन बहुत ध्यान से करते है जिसके कारण उनकी हर गजल मुकम्मल होती है।  

कुछ और बरतना तो आता नहीं शे'रों में
सदमात बरतता था, सदमात बरतता हूँ

जीने की कोशिशों के नतीज़े में बारहामहसूस ये हुआ कि मैं कुछ और मर गया

अब मेरा अपने दोस्त से रिश्ता अजीब हैहर पल वो मेरे डर में है, मैं उसके डर में हूँ।  

है सदियों से दुनिया में दुख़ की हकूमतखु़दा! अब तो ये हुक्मरानी बदल दे

वो खुशनसीब हैं, सुनकर कहानी परियों कीजो अपनी दर्द भरी दास्तान भूल गए

राजेश रेड्डी, जिनको सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' सम्मान मिल चुका है , उस लहज़े के शायर है जिन्हे सिर्फ महबूबा की जुल्फे या जिंदगी की कश्मकश नजर नहीं आती बल्कि इंसानी वजूद के हर उस मंजर पर वो बखूबी लिखना जानते है जिससे एक आम आदमी बेचैन हो जाता है।  रवायात के दायरे में रह के मौजूदा दौर पे शेर लिखना जिसमे एक छोटे बच्चे का खिलौना भी शामिल है , एक बुढ़िया की लाठी भी, एक परिंदे का दर्द भी और एक मजलूम की चीख भी।  गज़ल  को बहुत गर्व होता होगा ये सोच कर कि सारी बंदिशों के बावजूद एक शायर हर गज़ल में सुर और ताल को भी बखूबी पिरोता है।  घर में मौसिकी का  माहौल पहले से था सो राजेश रेड्डी  को ये आयाम विरासत में मिला।  लेकिन मौसिकी के अलावा उनका तजुर्बा और जिंदगी की समझ उनके अशआर में बेहतरीन ढंग से नजर आता है।  

शाम को जिस वक़्त ख़ाली हाथ घर जाता हूँ मैं
मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूँ मैं
  

तेरी महफ़िल से दिल कुछ और तनहा होके लौटा है
ये लेने क्या गया था और क्या घर लेके आया है

गीता हूँ कुरआन हूँ मैं
मुझको पढ़ इंसान हूँ मैं

ज़िन्दा हूँ सच बोल के भी
देख के ख़ुद हैरान हूँ मैं

इतनी मुश्किल दुनिया में
क्यूँ इतना आसान हूँ मैं

मेह्रबाँ जब तक हवायें हैं तभी तक
इस दिए में रोशनी बाक़ी रहेगी

कौन दुनिया में मुकम्मल हो सका है
कुछ न कुछ सब में कमी बाक़ी रहेगी


'दीवाने - ग़ालिब ' को उस्ताद मान कर राजेश रेड्डी ने अपने शायरी के सफर का आगाज़ किया।  लेकिन उनकी शायरी में ग़ालिब से लेकर मजरूह सुल्तानपुरी तक का सफर दिखाई देता है।  एक बात है जो मुझे राजेश रेड्डी जी का मुरीद बनाती है वो है उनका संजीदा मुद्दों पे लफ्जो की नक्काशी , उन्होंने तंज नहीं कसा किसी पे।  संजीदा मुद्दों को उसी संजीदगी से पेश किया और उसी क्रम में गजल की नियमावली का पालन भी किया। 

कोई भी जाना नहीं चाहता क्यूँ दुनिया से
इस सराए में ,मैं हैरान हूँ , ऐसा क्या है

क्या जाने किस जहाँ में मिलेगा हमें सुकून
नाराज़ है ज़मीं से ख़फा आसमां से हम

ये और बात है कि ज़ुदा है मेरी नमाज़
अल्लाह जानता है कि काफ़िर नहीं हूँ मैं

जितना मैंने लिखा है वो बिलकुल सूरज को दीया दिखाने के बराबर है। अभी इनपर बहुत कुछ लिखा जाना बाकी है और ये सिलसिला चलता रहेगा जबतक गज़ल के कद्रदान ज़िंदा है।  अंत में राजेश रेड्डी की वो गज़ल जिसको जगजीत सिंह ने गाया भी और राजेश रेड्डी को दुनिया भर में मशहूर किया।  

यहाँ हर शख़्स हर पल हादिसा होने से डरता है
खिलौना है जो मिट्टी का फ़ना होने से डरता है

मेरे दिल के किसी कोने में इक मासूम-सा बच्चा
बड़ों की देख कर दुनिया बड़ा होने से डरता है

न बस में ज़िन्दगी इसके न क़ाबू मौत पर इसका
मगर इन्सान फिर भी कब ख़ुदा होने से डरता है

अज़ब ये ज़िन्दगी की क़ैद है, दुनिया का हर इन्सां
रिहाई मांगता है और रिहा होने से डरता है

मौलवी साहब

पहले घर की दालान से शिव मंदिर दिखता था आहिस्ता आहिस्ता साल दर साल रंग बिरंगे पत्थरों ने घेर लिया मेरी आँख और शिव मंदिर के बिच के फासले क...