Wednesday, 12 September 2018

घुमक्कड़ों की टोली पहुंची मुक्तेश्वर ( 8 से 10 सितम्बर 2018 )

घुमक्कड़ों की टोली पहुंची मुक्तेश्वर ( 8 से 10 सितम्बर 2018 )

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वो बंजारा भी जीने का अजब अंदाज रखता है
जो इतना दर-बदर होते हुए भी बेघर नहीं लगता  

नईम अख्तर बुरहानपुरी साहब का ये शेर शायद खुद में काफी है नीचे लगे फोटो की तर्जुमानी के लिए। हर एक यात्रा मेरे लिए हमेशा एक नई किताब की तरह होती है जिसके हर पन्ने में  अनुभवों का भण्डार होता है शब्दों के आगे पीछे और बीच में ना जाने कितने किस्से छुपे होते है। वैसे ही एक नई किताब सामने आई मुक्तेश्वर यात्रा जो उत्तराखंड के नैनीताल जिले में कुमाऊँ की पहाडियों में २२८६ मीटर (७५०० फीट) की ऊँचाई पर स्थित है।मौक़ा दस्तूर और प्रबंध का सारा जिम्मा का था हालांकि पहली मुलाक़ात में ही मेहमानी और मेजबानी की दूरिया मिट गई।  नए दोस्त , गीतों और गजलों से भरी गुलाबी ठण्ड के बीच महफ़िलें , साथियो के अनुभव और ना जाने क्या क्या। कुछ साथियों का परिचय देना जरुरी है , निशांत एक वीडियो ब्लौगर है और भारत भ्रमण कर चुका है। नीलिशा बिजनौर से आई थी और पकिया घुमक्कड़ है। प्रीतम और आर्का दास पश्चिम बंगाल का नेतृत्व कर रहे थी , प्रीतम ने एवरेस्ट बेस कैम्प की यात्रा इस साल।  इसी बेस कैम्प को जॉनी ने भी कवर कर रखा है और वो हरियाणा से है। अवंतिका दिल्ली से थी और यात्रा का जूनून उनके अनुभवों में झलकता है।  साहिल के अनुभव दिल को छू गए , सतत पर्यटन के लिए वो काफी काम कर रहे है और आप उनकी यात्राओं के बारे में ghoomakad.in से जान सकते है।  मेजबानी का जिम्मा Club ten pine lodge और खास कर प्रजापति जी और आशीष के कंधे पे था।  मोहित स्वभाव से अनुभवी और हल्द्वानी का प्रतिनिधित्व  कर रहे थे। आकाश इटावा से है और उनकी चुलबुली हरकतों ने माहौल को स्वस्थ बना रखा। जॉय से पहले भी  दिल्ली के कई इवेंट्स में मुलाकात हो रखी थी और उनका अनुभव "फ़ूड ब्लॉगिंग " के क्षेत्र में काफी अच्छा है।  

भालूगढ़ जलप्रपात और मुक्तेश्वर मठ की यात्रा अविस्मरणीय रही।  लेकिन यात्रा के अलावा जो बात पुरे दौरे को यादगार बनाती है वो है Club 10 Pine Lodge और इस होटल के मालिक धीरज जी की मेहमानवाज़ी। देश के लगभग सभी हिस्सों को  घुमा है। अगर किसी चीज की तलाश एक यात्री को होती है तो वो होता है गर्मजोशी से ओत प्रोत करने वाली मेहमानवाज़ी। 

इस यात्रा की शुरुआत दिल्ली से हुई और हम NH-24 से होते हुए गढ़ मुक्तेश्वर , मुरादाबाद ,हल्द्वानी पार करते हुए मुक्तेश्वर पहुंचे। रास्ते में एक दूसरे के अनुभवों को सुनना बहुत आनंददायक था।  एक यात्री आपको बैठे बैठे पूरी दुनिया की सच्ची सैर करा सकता है , और हम तो १२ थे।  Club 10 Pine Lodge को जिस बारीकी और मोहब्बत से बनाया गया है वो आपको मोहित कर लेगा। इसी मनमोहक फ़ज़ा के बीच रात को महफ़िलों का जो लुत्फ़ आया उसपर पूरी किताब लिखी जा सकती है। गीता दत्त से ले कर आतिफ तक का सफर हम सभी यात्रियों ने मिल कर लिया।  हमारे सुर हर एक शख्सियत के अनुभवों के तान पर थे। Club 10 Pine lodge के बारे में अगर आपको और जानना है तो आप नीचे दिए लिंक्स पे जा  सकते है।  







''सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहाँ?
जिंदगी गर कुछ रही तो नौजवानी फिर कहाँ?''

दुनिया में मनुष्‍य-जन्‍म एक ही बार होता है और जवानी भी केवल एक ही बार आती है। साहसी और मनस्वी तरुण-तरुणियों को इस अवसर से हाथ नहीं धोना चाहिए। कमर बाँध लो भावी घुमक्कड़ो! संसार तुम्‍हारे स्वागत के लिए बेकरार है।









Monday, 20 August 2018

टाइम पास नोट्स

उस रात कोई एक शुक्राणु टकरा गया था प्रकृति के नियमानुसार मादा के किसी अंडे से और जन्म मरण की प्रक्रिया शुरू हो गई , नियति लिख दी गई , भाग्य मढ़  दिया गया, भविष्य गुंथा जाने लगा।  लेकिन किसका? प्रकृति और पुरुष दोनों नहीं जानते थे कि वो "हादसा" ( आप उसे घटना भी कह  सकते है ) जन्म देगा "मै "  को जो २०१८ में ये लेख रहा होऊंगा। नियति सिद्ध नहीं होती लेकिन आज "मै " एक सत्य है और उसके अलावा सब एक घटना है।  होने की प्रक्रिया के साथ होता गया हादसा।  हर घटना को हम नाम देते गए और जुड़ते गए घटनाओं को , दूर होते गए एक मात्र सत्य "मै " से।  तुम भी एक घटना हो जैसे  एक घटना है शुक्राणुओं का टकराना और  बना देना किसी को माता किसी को पिता और तुम्हे मेरा इश्क।  सत्य तुम्हारा "मै " है और मेरा "मै " तो बस बातचीत हो दोनों सत्य के बीच।  सत्य को सत्य से जोड़ो तो सत्य ही बनता है , थोड़ा भी झूट हो तो सत्य सत्य नहीं रहता , एक हादसा हो जाता है , एक घटना हो जाती है।  मेरी समझ से सत्य को सत्य से जोड़ना ही प्रेम है , इबादत है पूजा  है।  किसी का शेर है

जिस्म से रूह तक जाए तो हकीकत है इश्क,
और रूह से रूह तक जाए तो इबादत है इश्क़।

यहां जिस्म एक माध्यम है लेकिन अगर रूह तक जाए तभी वी सत्य है अथवा घटना।  तुम समझ रही हो ना ? घटना से अपने आप को मत जोड़ो सत्य ही असली नियति है उसकी खोज जारी रखो।

Monday, 13 August 2018

तुमसे डर क्यों लगता है ?

तुमसे डर क्यों लगता है ? ये सवाल तुमसे नहीं है, खुद से है।  शायद खुद से इसलिए क्योकि इसका जवाब तुम तो नहीं दोगी इसलिए दारोमदार खुद के कन्धों पे देना होगा।  मौन हर वक़्त तुम्हारा जवाब नहीं होता लेकिन तुम वो भी तो नहीं कहती जो कहना चाहती हो इसलिए खुद से साक्षात्कार ही सही लगता है। तुमसे डर खोने का डर नहीं है , तुमसे इश्क़ पाने के लिए नहीं है।  तुमसे दोस्ती एक वजह नहीं है ना आदत है , ना जूनून भी , बस है , क्यों है कारण क्या है पता नहीं ना मैंने खोजा है ना जरुरत लगती है । तुम्हारी आँखों में भी पाने और खोने की उम्मीद नहीं देखि मैंने।  सुकून लगता है इस माहौल में तुम्हारे साथ बैठना , चाय पीना और ये जानते हुए भी की बिछड़ना नियति तो है लेकिन हमारे रिश्ते में अब इसका कोई महत्व नहीं है। 

लेकिन फिर भी डर लगता है।  डर उन आंखों से नहीं है , उन चाहतों से नहीं है , उन लम्हों से नहीं है जिन्होंने सदियों का दुःख तुम्हारे दामन में बेवक्त लगा दिया। डर तुम्हारे अनजाने मौन का है। तहज़ीब हाफ़ी का एक शेर

मैं उस को हर रोज़ बस यही एक झूट सुनने को फ़ोन करता
सुनो यहाँ कोई मसअला है तुम्हारी आवाज़ कट रही है। 

ये शेर लगभग उसी दायरे की और सूचित करता है जो मेरे और तुम्हारे रिश्ते के बीच है।  होनी भी चाहिए , रिश्तों में दुरी सही होती है , मै ही पागल हूँ जो दोस्ती, यारी , आती जाती मोहब्बतों के दरम्यान दुरी मिटाने की कोशिश करता है।  खुसरो कहते थे
साजन हम तुम एक हैं और कहन सुनन को दो 
मन से मन को तोलिये सो दो मन कभऊ ना हो

मेरे लिए हर रिश्ता "दो मन कभऊ  ना हो" है।  मुझे फर्क नहीं पड़ता निभाने वाला क्या सोचता है , मै तो खुसरो का मुरीद हु, ना मानना ज्यादती होगी।  डर इसी बात का लगता है , मन कहीं दो तो नहीं है।  

फुटकर नोट्स 

Sunday, 24 June 2018

बोलती रहो.......


बोलती रहो.......
क्यों ?
तुम बोलती हो तो
ध्यान तुम्हारा कहीं और होता है
अच्छा , इस से तुम्हे क्या ?
मेरे ध्यान से तुम्हारा ध्यान
टकराता नहीं है
मेरे मार्ग में बाधक नहीं बनता
किस मार्ग में ?
पता नहीं
मेरे पैरों को सिरहाने बना
जब तुम आकाश को निहारती हुई
अपनी यादों में से शब्द निकालती  हो
तो ऐसा लगता है जैसे
तुम्हारी आँखों के रास्ते एक मार्ग है
जो सुदूर आकाशगंगा में
मेरे लिए अभी , बस अभी बना है
वही मार्ग
वहा अकेले जाओगे ?
हाँ

Monday, 12 March 2018

क्या आप अपना केस लड़ने में आर्थिक और कानूनी रूप से असमर्थ है ? Advok8 करेगा आपकी मदद

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने वकालत के पेशे के व्यावसायीकरण पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि अब अदालत में कानूनी लड़ाई लड़ना इतना महंगा हो गया है कि यह गरीब आदमी की पहुंच से बाहर हो चुका है। शीर्ष अदालत के अनुसार न्यायिक प्रक्रिया इतनी धीमी है कि लोग अब इस बात से आश्वस्त हो गए हैं कि मुकदमा उनके जीवनकाल में खत्म नहीं होगा। न्यायमूर्ति बीएस चौहान और न्यायमूर्ति एसए बोब्डे की खंडपीठ ने कहा कि वकालत को कभी कुलीन पेशे के रूप में जाना जाता था लेकिन मौजूदा दौर में यह पेशा व्यावसायिक आश्वासन में तब्दील हो गया है। 

न्यायाधीशों ने कहा कि न्याय प्रशासन में न्यायाधीशों के साथ ही वकीलों की समान भागीदारी होती है और वकील संदिग्ध व्यक्ति या सिर्फ मुकदमों के सहारे ही जीवन यापन करने वाले व्यक्ति जैसा आचरण नहीं कर सकते हैं। वकील द्वारा जानबूझ कर वादकारी के हितों की अनदेखी करना एक वकील के अनुरूप नहीं है।

 कानून व्यापार नहीं है। एक वकील अदालत का अधिकारी है और इस नाते उसका यह कर्तव्य है कि वह सुचारू ढंग से न्यायालय का कामकाज सुनिश्चत करे। वकील को संकट में घिरे व्यक्ति की उम्मीदे जगानी होती हैं और वह असहाय वादी का शोषण नहीं कर सकता है।

शीर्ष अदालत ने मुकदमे को लंबा खींचने और बहस के लिए दूसरे वकील की सेवायें लेने जैसी गतिविधियों पर भी प्रतिकूल टिप्पणी की और कहा कि यह तो वादी को अपने जाल में फंसाने जैसा हुआ जो नैतिक रूप से और पेशेगत दृष्टि से ठीक नहीं है।

लेकिन अब इन समस्याओं का निदान संभव है , अगर आप अपना केस लड़ने में आर्थिक और कानूनी रूप से असमर्थ है तो आपकी मदद करेगा advok8.in Third party litigation funding के द्वारा ना केवल वो आपकी कानूनी रूप से सहायता करेगा बल्कि आर्थिक मदद करेगा।  के मार्केटिंग हेड सौरव कुमार सिन्हा का कहना है  कि हमारा लक्ष्य देश में लोगो को कानूनी रूप से जागरूक एवं सजग करना है।  अपने एप के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा की अभी तक 10000  से ज्यादा वकील उनके साथ जुड़ चुके है और एप पे दी जाने वाली टेक्नोलॉजी  से वकीलों की कार्यक्षमता में बढ़ावा हुआ है और उनका काम पहले से ज्यादा सुचारु रूप से चल रहा है।  

कंपनी के फाउंडर कुंदन कुमार ने इस बात पे जोर डाला की उनका प्रोजेक्ट जटिल प्रक्रिया को सरल बनाना और भविष्य में लीगल इंशोरेंस और लीगल काल सेंटर जिससे दर्ज केसों की संख्या में गिरावट आने  पे केंद्रित है। उन्होंने बताया की दीपक गोयल जो की एक एंजल इन्वेस्टर है से उन्हें सीड फंडिंग मिल चुकी है और आने वाले दो महीनो में राउंड A की संभावना बड़ी प्रबल है।  केवल १५ दिनों के अंतराल में 70 से ज्यादा केसेस दर्ज हो चुके है और काम  जारी है।  अगर आपको इस विषय पे जानकारी चाहिए तो आप +91 -7838304699 पे संपर्क कर सकते है या info@advok8.in पे मेल भेज सकते है।  



Sunday, 29 October 2017

मिलने की घड़ी जब आ जाती है

मिलने  की घड़ी जब आ जाती है 
कुछ खुशबु सा महका जाती है 

वो फिर भंवरा बन कर उड़ता है 
तू जिसकी गली मंडरा जाती है 

हाय ! कयामत क्यों ना बरसे 
तू थोड़ा जो शरमा जाती है 

वो तो बस एक शीशा है 
तू खुद से क्यों घबरा जाती है 

उफ्फ ! तेरे घुंगराले बाल 
उसे देख देख बदरा छाती है 




Thursday, 17 August 2017

सेल्फी स्वैग कैफे : कॉफी कल्चर की दुनिया में एक अनूठा प्रयोग

“सेल्फी”, एक ऐसा फीवर जिससे आज के वक्त में बच्चे से लेकर बड़ों तक कोई भी अछूता नहीं रह गया है। अपनी सेल्फी क्लिक कर सोशल मीडिया पर पोस्ट करने वालों की भरमार है। आपने भी अपने आस-पास देखा होगा या फिर आपको खुद भी सेल्फी का क्रेज जरूर होगा सेल्फी का फीवर पूरी दुनिया को अपने गिरफ्त में किए हुए है. बिरले ही कोई ऐसा शख्स होगा जिसे सेल्फी जैसी चीज से परहेज हो।  खुद को कैमरे में कैद करने की इस कला का हर एज ग्रुप दीवाना हो चुका है। अगर यही सेल्फी आपको अपनी कॉफी के झाग के ऊपर मिले तो आपको कैसा लगेगा ? है ना अचरज की बात? इसी अचरज को सच कर दिखाया है अनित डैंग और आशित मेहरा ने।  भारत के सबसे बड़े मॉल , डी एल एफ माल ऑफ इंडिया के दूसरे माले पे स्थित ये सेल्फी स्वैग कैफे  कॉफी कल्चर की दुनिया में एक अनूठा प्रयोग है।  आप अपनी सेल्फी ले कर काउंटर पर दे देते है और जब कॉफी आपके सामने आती है तो उसके ऊपर आपका दिया हुआ सेल्फी होता है।  

लेकिन बात सिर्फ सेल्फी की  नहीं है।  इस प्रयोग के साथ खाने के स्वाद और कॉफी की गुणवत्ता का भी ख़ास ध्यान दिया गया है।  आप अनेक तरह के सैंडविच के साथ इस कॉफी का मजा ले सकते है।  ख़ास बात ये है कि ये सेल्फी आपको कॉफी के अलग अलग फ्लेवर्स के साथ भी  मिल जाएगी। लोगों के बिच ये प्रयोग खासा सफल हो रहा है और खासकर युवा वर्ग इसे ले कर बहुत उत्साहित है। अनित डैंग और आशित मेहरा का अगला लक्ष्य इसे देश के कोने कोने में पहुंचाना है।  

मौलवी साहब

पहले घर की दालान से शिव मंदिर दिखता था आहिस्ता आहिस्ता साल दर साल रंग बिरंगे पत्थरों ने घेर लिया मेरी आँख और शिव मंदिर के बिच के फासले क...